देश के अधिकांश हिस्सों में लोग तपती गर्मी से राहत और खेतों में हरियाली लाने वाली बारिश का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं, लेकिन फिलहाल दक्षिण-पश्चिम मानसून की चाल कुछ सुस्त पड़ती दिखाई दे रही है। मौसम विभाग के ताजा आकलन ने किसानों, कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंताएं बढ़ा दी हैं। सामान्य परिस्थितियों में जून का महीना खरीफ सीजन की तैयारियों का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है, जब बारिश के साथ खेतों में बुवाई का काम तेजी पकड़ता है। हालांकि इस बार मानसून की रफ्तार धीमी होने से कई राज्यों में खेती-किसानी की गतिविधियां प्रभावित होने लगी हैं। भारतीय मौसम विभाग के अनुसार, अगले लगभग दो सप्ताह तक मध्य और उत्तर भारत के कई हिस्सों में सामान्य से कम वर्षा होने की संभावना है।
मानसून की यह सुस्ती ऐसे समय सामने आई है जब लाखों किसान धान, सोयाबीन, कपास, मक्का और दलहन जैसी खरीफ फसलों की बुवाई की तैयारी में जुटे हुए हैं। पर्याप्त वर्षा नहीं होने से खेतों में आवश्यक नमी नहीं बन पा रही है, जिससे बुवाई का कार्य प्रभावित हो सकता है। मानसून की गति धीमी पड़ने के पीछे पश्चिमी विक्षोभों की सक्रियता एक प्रमुख कारण है। इन मौसमी प्रणालियों ने मानसून के उत्तर और मध्य भारत की ओर तेजी से बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित किया है। परिणामस्वरूप जिन क्षेत्रों में इस समय तक अच्छी वर्षा पहुंच जानी चाहिए थी, वहां बारिश अपेक्षाकृत कम दर्ज की जा रही है। देश की कृषि व्यवस्था आज भी बड़े पैमाने पर मानसून पर निर्भर है। सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के बावजूद करोड़ों किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं। ऐसे में मानसून की धीमी प्रगति का सीधा असर कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
यदि बारिश में और अधिक देरी होती है तो बुवाई का रकबा प्रभावित हो सकता है, जिसका असर आगे चलकर फसल उत्पादन पर भी देखने को मिल सकता है। कई राज्यों से मिली प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार किसान फिलहाल बारिश का इंतजार कर रहे हैं। खेत तैयार हैं, बीज उपलब्ध हैं, लेकिन पर्याप्त नमी नहीं होने के कारण बुवाई का काम अपेक्षित गति नहीं पकड़ पा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अगले कुछ दिनों में यदि अच्छी बारिश नहीं हुई तो किसानों को वैकल्पिक रणनीतियों पर विचार करना पड़ सकता है। इस बीच मौसम विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि मानसून पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ा है, बल्कि उसकी प्रगति अस्थायी रूप से धीमी हुई है। विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और मौसम के बदलते पैटर्न का विश्लेषण कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जून के दूसरे पखवाड़े में परिस्थितियां बेहतर हो सकती हैं।
दक्षिण भारत में बरकरार है बारिश का सिलसिला, महीने के अंत में मिल सकती है बड़ी राहत
जहां उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में बारिश की कमी चिंता बढ़ा रही है, वहीं दक्षिण भारत के अनेक राज्यों में स्थिति अपेक्षाकृत संतोषजनक बनी हुई है। केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ क्षेत्रों में अच्छी वर्षा जारी रहने की संभावना जताई गई है। इन इलाकों में मानसून सक्रिय बना हुआ है और किसानों को फिलहाल अधिक परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है। दक्षिणी राज्यों में लगातार हो रही वर्षा से जलाशयों, बांधों और जल स्रोतों में पानी की आवक बनी हुई है। इससे सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिहाज से राहत मिलने की उम्मीद है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में खरीफ फसलों की बुवाई अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है और बारिश का क्रम जारी रहने पर कृषि गतिविधियों को गति मिलेगी। हालांकि इस वर्ष मानसून की शुरुआत भी अपेक्षा के अनुरूप नहीं रही। मानसून ने केरल में सामान्य समय से कुछ देरी से दस्तक दी थी। इसके बाद उसकी प्रगति भी असमान रही। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून के पहले दस दिनों में देशभर में सामान्य से लगभग 26.5 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है।
यह कमी संकेत देती है कि मानसून का शुरुआती चरण अपेक्षाकृत कमजोर रहा है। बारिश की इस कमी का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है। जल प्रबंधन, बिजली उत्पादन, भूजल स्तर और ग्रामीण रोजगार जैसी कई गतिविधियां भी मानसून पर निर्भर करती हैं। इसलिए मानसून की हर गतिविधि पर सरकारों, कृषि क्षेत्र और बाजार की पैनी नजर बनी हुई है। इसके बावजूद मौसम विभाग ने राहत की उम्मीद जताई है। विभाग का अनुमान है कि जून के अंतिम सप्ताह में मानसून फिर से सक्रिय हो सकता है और वर्षा की गतिविधियों में तेजी आ सकती है। यदि समुद्री और वायुमंडलीय परिस्थितियां अनुकूल बनी रहीं तो मानसून तेजी से आगे बढ़ेगा और देश के शेष हिस्सों को भी कवर करेगा।
यदि जून के अंत तक अच्छी बारिश होती है तो वर्तमान स्थिति में काफी सुधार आ सकता है। इससे खेतों में पर्याप्त नमी पहुंचेगी, बुवाई की रफ्तार बढ़ेगी और किसानों की चिंताएं काफी हद तक कम हो जाएंगी। कृषि बाजार भी मानसून की वापसी का इंतजार कर रहा है, क्योंकि अच्छी वर्षा का सीधा असर उत्पादन और कीमतों पर पड़ता है। फिलहाल देशभर के किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं की नजर अगले दो सप्ताह पर टिकी हुई है। मानसून की अगली चाल तय करेगी कि खरीफ सीजन कितनी मजबूती के साथ आगे बढ़ेगा। यदि मौसम विभाग का अनुमान सही साबित होता है तो जून का अंतिम सप्ताह किसानों के लिए राहत और उम्मीद लेकर आ सकता है।

















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