हर राजनीतिक संकट में कांग्रेस के साथ खड़े रहे डीके शिवकुमार, अब मिला मुख्यमंत्री पद का इनाम

कर्नाटक की राजनीति में महीनों से चल रहा सत्ता संघर्ष आखिरकार अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया। लंबे समय से मुख्यमंत्री पद को लेकर चल रही खींचतान के बाद अब साफ हो गया है कि सिद्दारमैया की सत्ता से विदाई तय मानी जा रही है और उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी रहे डीके शिवकुमार राज्य की कमान संभालने जा रहे हैं। कांग्रेस के भीतर यह लड़ाई किसी आम राजनीतिक विवाद की तरह नहीं थी, बल्कि यह दो बड़े ताकतवर नेताओं के बीच प्रतिष्ठा, जनाधार और संगठनात्मक पकड़ की असली परीक्षा बन चुकी थी। एक तरफ सिद्दारमैया थे, जिनके पास प्रशासनिक अनुभव, पिछड़ा वर्ग की मजबूत राजनीति और लंबे समय का राजनीतिक कद था, तो दूसरी तरफ डीके शिवकुमार थे, जिन्हें कांग्रेस का सबसे भरोसेमंद संकटमोचक माना जाता है। 

महीनों तक दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक बैठकों का दौर चला, पर्यवेक्षक बदले गए, समीकरण बने और बिगड़े, लेकिन अंत में कांग्रेस आलाकमान ने उस नेता पर भरोसा जताया जिसने हर संकट में पार्टी को टूटने से बचाया। डीके शिवकुमार का जन्म 15 मई 1962 को कर्नाटक के रामनगर जिले के कनकपुरा तालुक स्थित दोड्डआलाहल्ली गांव में हुआ। वे एक साधारण कृषि परिवार से आते हैं और प्रभावशाली वोक्कालिगा समुदाय से संबंध रखते हैं। कर्नाटक की राजनीति में यह समुदाय हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। शुरुआती पढ़ाई-लिखाई बेंगलुरु में हुई और छात्र जीवन से ही उनका झुकाव राजनीति की ओर हो गया था। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से की। छात्र राजनीति में सक्रियता और संगठन क्षमता की वजह से वे जल्द ही युवा कांग्रेस में पहचान बनाने लगे। कांग्रेस नेतृत्व ने उनमें शुरुआत से ही एक आक्रामक और जमीन से जुड़े नेता की छवि देखी थी। यही वजह रही कि बेहद कम उम्र में उन्हें बड़े नेताओं के खिलाफ चुनावी मैदान में उतार दिया गया। 

साल 1985 में जब डीके शिवकुमार सिर्फ 23 साल के थे, तब कांग्रेस ने उन्हें सैटनूर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया। उनके सामने जनता दल के दिग्गज नेता एचडी देवेगौड़ा थे, जो बाद में देश के प्रधानमंत्री भी बने। हालांकि शिवकुमार यह चुनाव हार गए, लेकिन जिस तरह उन्होंने देवेगौड़ा को कड़ी टक्कर दी, उसने कांग्रेस हाईकमान का ध्यान उनकी ओर खींच लिया। इसके बाद 1989 में उन्होंने दोबारा चुनाव लड़ा और पहली बार विधानसभा पहुंचे। यहीं से उनकी राजनीतिक यात्रा ने असली रफ्तार पकड़ी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे लगातार सैटनूर और बाद में कनकपुरा सीट से जीत दर्ज करते रहे। कर्नाटक की राजनीति में उनकी पहचान एक ऐसे नेता की बन गई, जिसे चुनावी मैदान में हराना बेहद मुश्किल माना जाता है। डीके शिवकुमार अब तक लगातार आठ बार विधानसभा चुनाव जीत चुके हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत दर्ज की। उन्होंने भाजपा नेता आर. अशोक को रिकॉर्ड 1.22 लाख से ज्यादा वोटों से हराया। उस समय मुख्यमंत्री पद की दौड़ में उनका नाम सबसे आगे था, लेकिन कांग्रेस ने सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री और डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम बनाकर सत्ता संतुलन साधने की कोशिश की थी। 

हालांकि यह संतुलन ज्यादा लंबे समय तक टिक नहीं सका। कांग्रेस के भीतर डीके शिवकुमार की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ उनका जनाधार नहीं, बल्कि संकट के समय पार्टी को बचाने की उनकी क्षमता मानी जाती है। यही वजह है कि उन्हें कांग्रेस का राष्ट्रीय “संकटमोचक” कहा जाता है। जब-जब पार्टी टूटने, सरकार गिरने या विधायकों के बिखरने के संकट में फंसी, तब-तब डीके शिवकुमार ने मोर्चा संभाला। साल 2002 में महाराष्ट्र में विलासराव देशमुख सरकार पर संकट आया तो कांग्रेस विधायकों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी डीके शिवकुमार ने संभाली। उन्होंने विधायकों को बेंगलुरु के रिसॉर्ट में रखा और सरकार को बचाने में अहम भूमिका निभाई। 2017 में गुजरात राज्यसभा चुनाव के दौरान अहमद पटेल की सीट बचाना कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया था। भाजपा पर विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लग रहे थे। ऐसे समय में डीके शिवकुमार ने 42 कांग्रेस विधायकों को बेंगलुरु में सुरक्षित रखा। उनके ठिकानों पर आयकर विभाग के छापे भी पड़े, लेकिन वे पीछे नहीं हटे और आखिरकार अहमद पटेल चुनाव जीत गए। इस घटना के बाद कांग्रेस में उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ गया।

कांग्रेस का सबसे ताकतवर संकटमोचक, जिसके पास है अपार दौलत और मजबूत संगठन

2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद जब राज्य में त्रिशंकु स्थिति बनी, तब भाजपा सरकार बनाने की कोशिश में थी। उस समय कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन के विधायकों को एकजुट रखने में डीके शिवकुमार की भूमिका सबसे अहम मानी गई। उन्होंने होटल राजनीति से लेकर विधायकों की निगरानी तक हर मोर्चे पर सक्रिय रहकर भाजपा को बहुमत साबित करने से रोक दिया। इसके बाद राज्य में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन की सरकार बनी। सिर्फ कर्नाटक ही नहीं, बल्कि 2024 में हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस सरकार पर संकट आया तो पार्टी ने डीके शिवकुमार को ही मैदान में उतारा। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के बाद सुखविंदर सिंह सुक्खू सरकार गिरने की कगार पर पहुंच गई थी। ऐसे समय में शिवकुमार शिमला पहुंचे, नाराज विधायकों से बातचीत की और सरकार को बचाने में अहम भूमिका निभाई। 

डीके शिवकुमार की राजनीति सिर्फ संगठन और रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि वे कांग्रेस के सबसे अमीर नेताओं में भी गिने जाते हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और 2023 के विधानसभा चुनाव में दाखिल हलफनामे के अनुसार उनकी कुल संपत्ति 1413 करोड़ रुपये से ज्यादा बताई गई थी। इसी के साथ वे देश के सबसे अमीर विधायकों में शामिल हो गए थे। उनकी चल संपत्ति लगभग 1140 करोड़ रुपये बताई गई है, जिसमें कंपनियों के शेयर, बैंक डिपॉजिट, निवेश, बॉन्ड और महंगे आभूषण शामिल हैं। वहीं उनकी अचल संपत्ति करीब 273 करोड़ रुपये की है। इसमें बेंगलुरु समेत कई शहरों में कमर्शियल बिल्डिंग, कृषि भूमि और बड़े रियल एस्टेट प्रोजेक्ट शामिल हैं। 

हालांकि उनके ऊपर करीब 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज भी घोषित है। डीके शिवकुमार की राजनीति का सबसे अहम पहलू उनका आक्रामक अंदाज और संगठन पर मजबूत पकड़ मानी जाती है। वे सिर्फ चुनाव जीतने वाले नेता नहीं, बल्कि राजनीतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने में भी माहिर माने जाते हैं। कांग्रेस के भीतर उनकी पहुंच गांधी परिवार से लेकर प्रदेश संगठन तक बेहद मजबूत मानी जाती है।

यही वजह है कि सिद्दारमैया जैसे मजबूत और अनुभवी नेता के सामने भी वे लगातार अपनी दावेदारी बनाए रखने में सफल रहे। कर्नाटक की सत्ता में यह बदलाव सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने भर की कहानी नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर बदलते शक्ति संतुलन का भी संकेत माना जा रहा है। अब सबसे बड़ी चुनौती डीके शिवकुमार के सामने खुद को सिर्फ संकटमोचक नहीं, बल्कि एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में साबित करने की होगी। कर्नाटक की राजनीति में उनकी अगली पारी कितनी सफल होगी, इस पर पूरे देश की नजरें टिकी रहेंगी।

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