तीन महीने के महायुद्ध पर विराम, अमेरिका-ईरान समझौते से खुला होर्मुज, तेल बाजार को बड़ी राहत

करीब तीन महीने से वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और मध्य पूर्व की स्थिरता पर मंडरा रहा युद्ध का साया आखिरकार छंटता दिखाई दे रहा है। दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण तेल आपूर्ति लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी टकराव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच ऐतिहासिक शांति समझौते पर सहमति बनने का दावा किया गया है। इस घटनाक्रम ने न केवल युद्ध की आशंकाओं को कम किया है, बल्कि वैश्विक बाजारों को भी बड़ी राहत दी है। तेल की कीमतों में नरमी आने की उम्मीद के साथ दुनिया भर के व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्रों ने राहत की सांस ली है। लंबे समय से तनाव, प्रतिबंधों और सैन्य कार्रवाइयों से जूझ रहे मध्य पूर्व में यह समझौता एक नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। 

पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता में हुई इस पहल को क्षेत्रीय कूटनीति की बड़ी सफलता बताया जा रहा है। हालांकि अंतिम औपचारिक हस्ताक्षर अभी बाकी हैं, लेकिन दोनों पक्षों द्वारा समझौते की पुष्टि ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक संदेश भेजा है। हाल के वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाओं में से एक मान रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इस समझौते की घोषणा करते हुए कहा कि इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। उन्होंने सभी पक्षों को बधाई देते हुए कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शुल्क के फिर से खोलने की अनुमति दी जा रही है और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल प्रभाव से हटाया जा रहा है। ट्रंप ने अपने संदेश में लिखा कि दुनिया के जहाज अब अपने इंजन चालू करें और तेल को फिर से स्वतंत्र रूप से बहने दें। 

यह घोषणा ऐसे समय में हुई है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पिछले कई सप्ताह से युद्ध की वजह से अस्थिरता का सामना कर रहे थे। होर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी तरह का व्यवधान सीधे तौर पर तेल की कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग पर बढ़ते तनाव ने कई देशों की चिंताएं बढ़ा दी थीं। इस समझौते में पाकिस्तान और कतर ने महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी साझा करते हुए कहा कि गहन और लंबी वार्ताओं के बाद दोनों पक्ष युद्ध समाप्त करने और स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ने पर सहमत हुए हैं। उन्होंने बताया कि आगामी 19 जून को स्विट्जरलैंड के जेनेवा में इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे।

कई दौर की बातचीत के बाद ऐसे बनी अमेरिका-ईरान समझौते की राह

समझौते के तहत अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लागू कुछ आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंधों में ढील देने पर सहमति जताई है। माना जा रहा है कि इससे ईरान को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल निर्यात बढ़ाने का अवसर मिलेगा और उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिल सकती है। दूसरी ओर अमेरिका को भी वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बहाल करने में मदद मिलेगी। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गारीबाबादी ने भी सरकारी टेलीविजन पर समझौते की पुष्टि की है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम हस्ताक्षर होने तक समझौते को पूर्ण रूप से लागू नहीं माना जाएगा। उनके अनुसार तेहरान में कतर के मध्यस्थों की मौजूदगी में 14 घंटे से अधिक समय तक चली मैराथन वार्ता के बाद दोनों पक्ष इस नतीजे पर पहुंचे। 

समझौते के बाद ईरानी मीडिया में भी इसे बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश किया गया। सरकारी टीवी चैनलों पर प्रसारित संदेशों में दावा किया गया कि अमेरिका को युद्ध समाप्त करने के लिए समझौते की राह अपनानी पड़ी। इस पूरे घटनाक्रम के दौरान इजरायल और ईरान समर्थित समूहों के बीच तनाव भी चर्चा का विषय बना रहा। वार्ता के अंतिम चरण में बेरूत के दक्षिणी इलाकों में हुए हमलों ने स्थिति को जटिल बना दिया था। इसके बावजूद बातचीत जारी रही और समझौते तक पहुंचने का रास्ता खुला रहा। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों पक्ष लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने पर सहमत हुए हैं। 

यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है तो इससे न केवल मध्य पूर्व में स्थिरता बढ़ेगी बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार को भी लंबे समय के लिए राहत मिल सकती है। हालांकि यह भी सच है कि युद्ध के दौरान हुई जनहानि, आर्थिक नुकसान और राजनीतिक अविश्वास को पूरी तरह खत्म होने में समय लगेगा। फिलहाल दुनिया की निगाहें 19 जून को जेनेवा में होने वाले औपचारिक हस्ताक्षर समारोह पर टिकी हैं। यदि वहां समझौते को अंतिम रूप मिल जाता है तो यह केवल अमेरिका और ईरान के रिश्तों में ही नहीं बल्कि पूरे मध्य पूर्व की राजनीति और वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में एक नए दौर की शुरुआत साबित हो सकता है। युद्ध की आग में झुलस रही दुनिया के लिए यह शांति की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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