हिमाचल प्रदेश में प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव की संभावनाएं तलाशने की तैयारी शुरू हो गई है। राज्य सरकार ने नए जिलों के गठन से लेकर मौजूदा प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन तक के विकल्पों की समीक्षा के लिए चार सदस्यीय आयोग गठित किया है। आयोग की रिपोर्ट यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि प्रदेश में आने वाले समय में नए जिले बनाए जाएं या फिर मौजूदा जिलों के भीतर तहसीलों, उपमंडलों और विकास खंडों की सीमाओं में बदलाव किया जाए। सरकार की इस पहल से उन क्षेत्रों में भी नई उम्मीदें जगी हैं, जहां लंबे समय से प्रशासनिक इकाइयों के विस्तार अथवा पुनर्गठन की मांग उठती रही है। हिमाचल प्रदेश भौगोलिक परिस्थितियों, पहाड़ी क्षेत्रों में दूर-दराज तक फैली आबादी और दुर्गम रास्तों के कारण प्रशासनिक दृष्टि से अलग चुनौतियों वाला राज्य है।
कई इलाकों में सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने के लिए लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। ऐसे में नए जिले बनाने या मौजूदा प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं में बदलाव का सवाल केवल भौगोलिक विभाजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध आम लोगों को सरकारी सेवाएं उपलब्ध कराने, प्रशासनिक पहुंच बढ़ाने और विकास योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन से भी जुड़ा है। राज्य सरकार ने इस पूरे विषय पर व्यवस्थित ढंग से विचार करने के लिए आयोग को जिम्मेदारी सौंपी है। आयोग विभिन्न प्रशासनिक इकाइयों की जरूरत, उनके मौजूदा स्वरूप और पुनर्गठन की संभावनाओं की समीक्षा करेगा। इसके आधार पर सरकार को सुझाव दिए जाएंगे, जिनके अनुरूप आगे की नीति तय की जा सकती है। हालांकि, आयोग के गठन का अर्थ यह नहीं है कि राज्य में नए जिले बनाने का फैसला हो चुका है।
अंतिम निर्णय आयोग की रिपोर्ट और सरकार के विचार-विमर्श के बाद ही लिया जाएगा। आयोग की अध्यक्षता हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस धर्म चंद चौधरी करेंगे। उनके नेतृत्व में गठित यह समिति प्रशासनिक सीमाओं में बदलाव से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करेगी। सरकार ने आयोग को अधिसूचना जारी होने की तारीख से छह महीने के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने की समय-सीमा दी है। इस अवधि में आयोग को अपने अध्ययन, समीक्षा और विचार-विमर्श के आधार पर सरकार के सामने सिफारिशें प्रस्तुत करनी होंगी।
आयोग का गठन ऐसे समय में हुआ है, जब पहाड़ी राज्यों में प्रशासनिक सुविधाओं को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप बनाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। हिमाचल प्रदेश में किसी नए जिले का गठन हो या तहसील और उपमंडल की सीमाओं में परिवर्तन, ऐसे निर्णयों का असर सरकारी कामकाज, स्थानीय विकास और नागरिक सुविधाओं पर पड़ सकता है। इसलिए आयोग की सिफारिशों को भविष्य के प्रशासनिक बदलावों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
नए जिलों के साथ तहसीलों और विकास खंडों की भी होगी समीक्षा
हिमाचल प्रदेश सरकार की ओर से गठित चार सदस्यीय आयोग में न्यायिक, प्रशासनिक और अन्य संबंधित क्षेत्रों के अनुभव को शामिल किया गया है। आयोग के अध्यक्ष जस्टिस धर्म चंद चौधरी हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश हैं। उनके साथ एडवोकेट विशाल पंवार और सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी राजेश शर्मा को सदस्य बनाया गया है। वहीं, हिमाचल प्रदेश के निदेशक, भू-अभिलेख को आयोग का सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है। सदस्य सचिव आयोग के कामकाज से संबंधित प्रशासनिक समन्वय और जरूरी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाएंगे। आयोग की कार्यप्रणाली में संबंधित विभागों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विशेष आमंत्रित अधिकारियों की व्यवस्था भी की गई है।
राजस्व, वित्त, ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज, वन, लोक निर्माण, जल शक्ति और सामान्य प्रशासन विभाग के प्रशासनिक सचिव जरूरत के अनुसार आयोग की बैठकों में विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल हो सकेंगे। इससे प्रशासनिक पुनर्गठन से जुड़े अलग-अलग विभागों के अनुभव और आवश्यकताओं को सामने रखने में मदद मिलेगी। आयोग का दायरा केवल नए जिलों के गठन की संभावनाओं की जांच तक सीमित नहीं रखा गया है। इसे उपमंडलों, तहसीलों, उपतहसीलों और विकास खंडों के पुनर्गठन की भी समीक्षा करनी है। इसके तहत इन प्रशासनिक इकाइयों के विलय, विभाजन और सीमाओं में संभावित बदलाव जैसे पहलुओं पर विचार किया जाएगा। इस तरह आयोग को प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे की व्यापक समीक्षा करने का अवसर मिलेगा।
फिलहाल हिमाचल प्रदेश में कुल 12 जिले हैं। नए जिले बनाने की मांग या प्रशासनिक इकाइयों में बदलाव का विषय सामने आने पर कई तरह के पहलुओं पर विचार करना जरूरी होता है। इनमें आबादी का फैलाव, भौगोलिक दूरी, मौजूदा जिला मुख्यालयों तक पहुंच, सरकारी कार्यालयों की उपलब्धता और प्रशासनिक संसाधनों की जरूरत शामिल हो सकती है। इसके अलावा नए कार्यालयों की स्थापना, कर्मचारियों की तैनाती और सरकारी खर्च जैसे विषय भी किसी बड़े पुनर्गठन के दौरान महत्वपूर्ण होते हैं। पहाड़ी इलाकों में प्रशासनिक सीमाओं का निर्धारण मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक जटिल हो सकता है। किसी क्षेत्र को जिला मुख्यालय से जोड़ने या अलग प्रशासनिक इकाई बनाने के फैसले में सड़क संपर्क, मौसम, प्राकृतिक बाधाओं और स्थानीय लोगों की जरूरतों को ध्यान में रखना पड़ता है। इसी तरह तहसील या उपमंडल के पुनर्गठन से भूमि संबंधी मामलों, राजस्व सेवाओं और अन्य सरकारी कार्यों के निपटारे पर भी असर पड़ सकता है। छह महीने की समय-सीमा में आयोग को इन पहलुओं की समीक्षा कर अपनी अंतिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंपनी होगी।
रिपोर्ट मिलने के बाद सरकार आयोग की सिफारिशों का अध्ययन करेगी और उनके आधार पर आगे की कार्रवाई पर विचार कर सकेगी। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित बदलाव प्रशासनिक सुविधा बढ़ाने के साथ-साथ वित्तीय और संसाधन संबंधी जरूरतों के लिहाज से कितने व्यावहारिक हैं। कुल मिलाकर, हिमाचल प्रदेश में आयोग का गठन राज्य के प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसकी रिपोर्ट से नए जिलों के गठन की संभावनाओं के साथ मौजूदा उपमंडलों, तहसीलों, उपतहसीलों और विकास खंडों के भविष्य को लेकर भी तस्वीर स्पष्ट हो सकती है। हालांकि, फिलहाल किसी नए जिले के गठन या किसी प्रशासनिक इकाई को समाप्त करने अथवा विभाजित करने का अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अब सबकी निगाहें आयोग की समीक्षा और छह महीने के भीतर सरकार को सौंपी जाने वाली रिपोर्ट पर रहेंगी।


















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