नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच भारत ने राहत और बचाव अभियान को और तेज कर दिया है। भीषण बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित इलाकों में फंसे भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकालने के साथ भारत लगातार चिकित्सा सामग्री, बचाव दल और आधुनिक उपकरण नेपाल भेज रहा है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, अब तक 166 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इनमें बुधवार को बचाए गए तीन भारतीय भी शामिल हैं। दूसरी ओर, तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में कैलाश मानसरोवर यात्रा और अन्य गतिविधियों के लिए गए 410 भारतीय नागरिक भी बुधवार को चीन से रवाना हो गए। नेपाल में राहत कार्यों के लिए भारत ने बुधवार को सहायता की पांचवीं खेप भेजी। भारतीय वायुसेना का एक विमान काठमांडू पहुंचा, जिसमें करीब 5.5 टन चिकित्सा सामग्री भेजी गई। इस सामग्री में एंटीबायोटिक, दर्द निवारक दवाएं, शल्य चिकित्सा उपकरण और अन्य जरूरी चिकित्सा सामान शामिल हैं। आपदा की गंभीरता को देखते हुए भारत ने केवल दवाइयां ही नहीं भेजीं, बल्कि बचाव अभियान को मजबूत करने के लिए 11 सदस्यीय विशेष बचाव दल और छह टन से अधिक आधुनिक बचाव उपकरण भी नेपाल भेजे हैं।
भारत की ओर से लगातार भेजी जा रही सहायता से नेपाल के प्रभावित क्षेत्रों में राहत कार्यों को गति मिली है। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, अब तक नेपाल को लगभग 74 टन राहत सामग्री उपलब्ध कराई जा चुकी है। भारतीय सहायता का उद्देश्य बाढ़ और मलबे से प्रभावित लोगों तक जरूरी चिकित्सा सुविधाएं और राहत सामग्री पहुंचाना तथा मुश्किल इलाकों में चल रहे बचाव अभियान को तकनीकी सहयोग देना है। 26 अगस्त को तिब्बत क्षेत्र में ग्लेशियर ध्वस्त होने के बाद अचानक आई भीषण बाढ़ ने नेपाल के कई इलाकों में भारी तबाही मचाई। प्राकृतिक आपदा के कारण बड़ी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की ओर आया, जिससे नदियों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया। कई स्थानों पर सड़कें, पुल और अन्य संपर्क मार्ग प्रभावित हुए। इसके चलते राहत और बचाव दलों के सामने प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचने की बड़ी चुनौती पैदा हुई।
विदेश मंत्रालय ने बताया कि भारत के राजदूत नवीन श्रीवास्तव ने राहत सामग्री नेपाल सरकार को सौंपी। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह इस कठिन समय में नेपाल के साथ खड़ा है और जरूरत के अनुसार राहत एवं बचाव सहायता उपलब्ध कराता रहेगा। भारतीय सुरंग बचाव दल ने भी अभियान के दौरान महत्वपूर्ण प्रगति की है। दल ने अपना आधार त्रिशूली से स्थानांतरित कर स्याब्रुबेसी में स्थापित कर लिया है। इससे चिलीमे सुरंग तक पहुंचने में लगने वाला समय कम होगा और बचाव अभियान को अधिक तेजी से संचालित किया जा सकेगा। नेपाली सेना के साथ संयुक्त अभियान में भारतीय दल सुरंग के भीतर करीब 100 मीटर तक आगे बढ़ने में सफल रहा है।
चिलीमे सुरंग मलबे और कीचड़ से बुरी तरह प्रभावित है। ऐसे में उसके भीतर आगे बढ़ना बेहद चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। बचाव दल आधुनिक उपकरणों की मदद से मलबा हटाने और संभावित रूप से फंसे लोगों की तलाश में जुटा है। भारी मशीनरी को सुरंग के पास पहुंचाने के लिए अस्थायी सड़क बनाने की संभावना भी तलाश की जा रही है। यदि यह रास्ता तैयार हो जाता है तो भारी उपकरणों को घटनास्थल तक पहुंचाना आसान होगा और अभियान की गति बढ़ सकती है। भारत से बुधवार को पहुंचे 11 विशेषज्ञ त्रिशूली बाजार के पास पहुंच चुके हैं। ये विशेषज्ञ गुरुवार से नेपाली सेना के साथ संयुक्त बचाव अभियान में शामिल होंगे। विशेषज्ञों की मौजूदगी से अभियान में तकनीकी क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और भारी मलबे के बीच सुरंग तक पहुंचने के लिए विशेष तकनीक और उपकरणों की आवश्यकता पड़ रही है।
1,114 शव बरामद, 3,916 लोग अब भी लापता, जलवायु संकट पर नेपाल ने जताई चिंता
नेपाल की राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, बुधवार सुबह तक बाढ़ और उससे जुड़ी घटनाओं में बहकर गए 1,114 लोगों के शव बरामद किए जा चुके थे। वहीं, 3,916 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने से आपदा की भयावहता का अंदाजा लगाया जा सकता है। बचाव दल लगातार प्रभावित इलाकों में तलाशी अभियान चला रहे हैं और मलबे में दबे या दूरदराज के क्षेत्रों में फंसे लोगों तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है। आपदा के बाद पहचान की प्रक्रिया भी एक बड़ी चुनौती बन गई है। इसी को देखते हुए भारत की फॉरेंसिक टीम काठमांडू की दो प्रयोगशालाओं में नेपाली विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम कर रही है। टीम डीएनए नमूनों की जांच और मृतकों की पहचान में सहयोग कर रही है। बड़ी संख्या में शव मिलने और कई लोगों के लापता होने की स्थिति में वैज्ञानिक तरीके से पहचान करना जरूरी हो गया है। भारतीय टीम इसी प्रक्रिया को तेज करने में नेपाल के विशेषज्ञों की मदद कर रही है।
नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने संसद में इस आपदा के व्यापक प्रभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते खतरों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गंभीरता से लेना होगा। उनके अनुसार, हाल की आपदा केवल नेपाल के लिए तत्काल राहत और पुनर्वास की चुनौती नहीं है, बल्कि यह भविष्य में हिमालयी क्षेत्र में बढ़ने वाले जलवायु संबंधी जोखिमों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। इस प्राकृतिक आपदा की शुरुआत नेपाल-चीन सीमा के पास लेंगदे खोला क्षेत्र में हिमस्खलन के कारण बने प्राकृतिक बांध से जुड़ी बताई जा रही है। प्राकृतिक रूप से बना यह बांध बाद में टूट गया, जिससे बड़ी मात्रा में पानी अचानक नीचे की ओर बह निकला। इसका सीधा असर भोटेकोशी नदी पर पड़ा और देखते ही देखते नदी में भीषण बाढ़ आ गई। तेज बहाव ने अपने रास्ते में आने वाले क्षेत्रों को प्रभावित किया और बाढ़ का असर त्रिशूली नदी तक पहुंच गया।
अचानक आए पानी और मलबे ने कई इलाकों में सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। संपर्क मार्गों के प्रभावित होने से बचाव दलों को घटनास्थल तक पहुंचने में परेशानी हुई। कई जगहों पर राहत सामग्री पहुंचाना भी चुनौतीपूर्ण रहा। ऐसे में भारत द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे विशेष बचाव उपकरण और विशेषज्ञ दल नेपाल के लिए महत्वपूर्ण सहायता साबित हो रहे हैं। भारत की ओर से चलाया जा रहा अभियान केवल राहत सामग्री भेजने तक सीमित नहीं है। भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी, सुरंग में बचाव अभियान, चिकित्सा सहायता, भारी उपकरणों की उपलब्धता और मृतकों की पहचान में फॉरेंसिक सहयोग जैसे कई स्तरों पर भारत नेपाल की मदद कर रहा है। वहीं, तिब्बत में मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षित वापसी भी प्राथमिकता में है। कैलाश मानसरोवर यात्रा और अन्य गतिविधियों के लिए तिब्बत गए 410 भारतीय नागरिक बुधवार को चीन से रवाना हो चुके हैं।
बाढ़ से हुई भारी तबाही के बीच नेपाल के सामने अब राहत के साथ-साथ पुनर्वास और बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करने की चुनौती भी होगी। बड़ी संख्या में लोगों की मौत और हजारों लोगों के लापता होने से प्रभावित परिवारों के सामने गहरा संकट खड़ा हो गया है। आने वाले दिनों में प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, दवाइयों, सुरक्षित पेयजल और आवास की जरूरत बढ़ सकती है।
भारत की लगातार सहायता से नेपाल में चल रहे राहत एवं बचाव अभियान को महत्वपूर्ण सहयोग मिल रहा है। पांचवीं खेप के रूप में चिकित्सा सामग्री और बचाव उपकरण भेजे जाने के बाद भारत ने संकेत दिया है कि जरूरत के अनुसार आगे भी सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। इस बीच, भारतीय और नेपाली टीमें कठिन परिस्थितियों में अभियान जारी रखे हुए हैं। उम्मीद है कि सुरंग और अन्य प्रभावित इलाकों में तलाशी अभियान के आगे बढ़ने के साथ लापता लोगों के बारे में और जानकारी मिल सकेगी तथा प्रभावित परिवारों तक राहत पहुंचाने की प्रक्रिया तेज होगी।


















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