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हिमाचल के सेब बागानों पर मौसम की मार, पिछले साल के मुकाबले आधी रह गई पैदावार, बागवानों की कमर टूटी

हिमाचल प्रदेश की पहचान और हजारों परिवारों की आजीविका का आधार माने जाने वाले सेब उद्योग पर इस बार मौसम की बेरुखी भारी पड़ गई है। कभी सेब की बंपर पैदावार के लिए पहचाने जाने वाले हिमाचल के बागानों में इस साल फलों की बहार कम दिखाई दी। नतीजा यह हुआ कि प्रदेश में सेब उत्पादन पिछले साल के मुकाबले आधे से भी कम रह गया। उत्पादन में आई इस भारी गिरावट ने न केवल बागवानों की सालभर की मेहनत पर पानी फेर दिया, बल्कि प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सामने भी बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जिन बागवानों को इस साल अच्छी पैदावार और बेहतर आमदनी की उम्मीद थी, उन्हें अब आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि सेब की पेटियों की संख्या में आई कमी ने बागवानी से जुड़े कारोबारियों, मजदूरों, परिवहन संचालकों और आढ़तियों तक की चिंता बढ़ा दी है। उत्पादन के आंकड़े इस संकट की गंभीरता को साफ तौर पर बयां कर रहे हैं। वर्ष 2025 में हिमाचल प्रदेश में करीब 3.49 करोड़ पेटियों का उत्पादन हुआ था। यह मात्रा लगभग 6.99 लाख मीट्रिक टन के बराबर थी। इसके विपरीत वर्ष 2026 में सेब उत्पादन घटकर 1.70 करोड़ पेटियों से भी नीचे पहुंच गया। यानी एक ही साल के भीतर प्रदेश में सेब की पैदावार में भारी गिरावट दर्ज की गई है। उत्पादन का यह अंतर उन हजारों बागवानों के लिए बड़ा झटका है, जिनकी आर्थिक स्थिति काफी हद तक सेब की फसल पर निर्भर करती है।

हिमाचल प्रदेश में सेब केवल एक फल या कृषि उत्पाद नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। शिमला, कुल्लू, मंडी, किन्नौर, चंबा और सिरमौर जैसे जिलों में बड़ी संख्या में परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर सेब बागवानी से जुड़ी हुई है। छोटे और सीमांत बागवानों से लेकर बड़े व्यावसायिक उत्पादकों तक के लिए सेब की फसल पूरे साल की आमदनी का प्रमुख साधन होती है। बागानों की देखभाल, खाद और दवाइयों का इस्तेमाल, पेड़ों की कटाई-छंटाई तथा मजदूरों की व्यवस्था पर बागवान पहले ही बड़ी रकम खर्च कर चुके होते हैं। ऐसे में जब फसल उम्मीद के मुताबिक तैयार नहीं होती तो उनकी लागत निकालना भी मुश्किल हो जाता है।

इस बार उत्पादन में आई गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह मौसम में हुआ असामान्य बदलाव माना जा रहा है। सेब के पेड़ों को बेहतर उत्पादन के लिए सर्दियों में एक निश्चित अवधि तक कम तापमान की आवश्यकता होती है। इसे चिलिंग आवर्स कहा जाता है। पर्याप्त ठंड मिलने पर पेड़ों में सही समय पर कलियां विकसित होती हैं और फूल आने की प्रक्रिया बेहतर रहती है। लेकिन इस बार सर्दियों में अपेक्षित ठंड नहीं मिलने से सेब के पेड़ों के प्राकृतिक विकास चक्र पर असर पड़ा। तापमान में उतार-चढ़ाव ने भी पेड़ों की सामान्य प्रक्रिया को प्रभावित किया। इसका सीधा असर फूल आने और फल बनने की स्थिति पर दिखाई दिया। सेब उत्पादन के लिए फ्लॉवरिंग और फ्रूट सेटिंग की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है। पेड़ों पर अच्छी तरह फूल आने के बाद ही पर्याप्त संख्या में फल तैयार हो पाते हैं। इस बार मौसम की अनियमितता के कारण कई क्षेत्रों में फूलों की स्थिति प्रभावित हुई। जहां फूल आए भी, वहां फल बनने की प्रक्रिया उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। इसके बाद बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने बागवानों की मुश्किलें और बढ़ा दीं। बारिश और ओलों से फूलों तथा शुरुआती अवस्था में तैयार हो रहे फलों को नुकसान पहुंचा। कई स्थानों पर मौसम की मार ने संभावित उत्पादन को और कम कर दिया।

जलवायु परिवर्तन का असर भी अब हिमाचल की पारंपरिक सेब पट्टी में महसूस किया जाने लगा है। तापमान में बदलाव, सर्दियों की अवधि में कमी और मौसम के पुराने चक्र में आ रहे परिवर्तन ने सेब उत्पादन के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। 

पहले जिन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सेब की खेती के लिए अनुकूल परिस्थितियां रहती थीं, वहां भी मौसम का व्यवहार बदल रहा है। वहीं, कम ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान बढ़ने के कारण पारंपरिक किस्मों की खेती प्रभावित होने की आशंका बढ़ रही है। इसके अलावा हिमाचल के कई क्षेत्रों में पुराने हो चुके सेब के बागीचे भी कम उत्पादन की एक बड़ी वजह हैं। लंबे समय से एक ही किस्म और पुराने पौधों पर निर्भर रहने के कारण कुछ बागानों की उत्पादकता प्रभावित हुई है। आधुनिक बागवानी तकनीकों, नई किस्मों और बदलती जलवायु के अनुरूप खेती अपनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। हालांकि छोटे बागवानों के लिए पुराने बागानों को बदलना आसान नहीं है। इसके लिए उन्हें नए पौधे लगाने, सिंचाई व्यवस्था विकसित करने और आधुनिक तकनीक अपनाने पर अतिरिक्त निवेश करना पड़ता है।

सेब की घटती पैदावार से हजारों परिवारों की आजीविका पर असर

उत्पादन में आई इस गिरावट का असर केवल बागवानों तक सीमित नहीं है। हिमाचल प्रदेश में सेब कारोबार से परिवहन, पैकेजिंग, भंडारण, मजदूरी, मंडियों और दूसरे कई छोटे-बड़े व्यवसाय जुड़े हुए हैं। सेब की पैदावार कम होने का मतलब इन सभी क्षेत्रों में कारोबार का प्रभावित होना भी है। सामान्य परिस्थितियों में सेब के सीजन के दौरान हजारों मजदूरों को रोजगार मिलता है। बागानों में तुड़ाई से लेकर पेटियों की पैकिंग और मंडियों तक फसल पहुंचाने में बड़ी संख्या में लोग काम करते हैं। उत्पादन कम होने से इन कामों के अवसर भी घटते हैं। आर्थिक नुकसान के आकलन को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, सेब अर्थव्यवस्था को करीब 20 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान जताया गया है। वहीं, कुछ अन्य मीडिया रिपोर्टों में लगभग 5,000 करोड़ रुपये की सेब अर्थव्यवस्था पर संकट मंडराने की बात कही गई है। 

हालांकि इन दोनों आंकड़ों का आकलन आधार अलग हो सकता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उत्पादन में आई भारी गिरावट ने हिमाचल के सबसे महत्वपूर्ण कृषि आधारित कारोबार को गंभीर चुनौती दी है। इस स्थिति ने प्रदेश में सेब बागवानी के भविष्य को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों और बागवानी से जुड़े लोगों के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि खेती के पुराने तौर-तरीकों के साथ ही बदलती जलवायु के अनुरूप नई व्यवस्था विकसित की जाए। कम ठंड में भी बेहतर उत्पादन देने वाली किस्मों को बढ़ावा देना, आधुनिक पौधरोपण तकनीक अपनाना, बागानों में सिंचाई की बेहतर व्यवस्था करना और मौसम आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना समय की मांग बन गया है।

बागवानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि मौसम पर उनका सीधा नियंत्रण नहीं है, जबकि उनकी पूरी आर्थिक योजना फसल पर निर्भर करती है। ऐसे में फसल बीमा, प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का समय पर आकलन और प्रभावित उत्पादकों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही पुराने बागानों के कायाकल्प के लिए सरकारी योजनाओं और तकनीकी सहयोग की जरूरत है।

हिमाचल में इस बार सेब की कम पैदावार ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि पहाड़ी राज्यों की पारंपरिक खेती जलवायु परिवर्तन के प्रति कितनी संवेदनशील है। यदि समय रहते बागवानी व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में उत्पादन की अनिश्चितता और बढ़ सकती है। ऐसे में चुनौती सिर्फ इस साल हुए नुकसान की भरपाई करने की नहीं, बल्कि हिमाचल के सेब उद्योग को बदलते मौसम के अनुरूप तैयार करने की भी है।

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