राजनीतिक दलों को मिलने वाले ऐसे नकद चंदे पर सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई होने जा रही है, जिसमें चंदा देने वाले की पहचान सार्वजनिक नहीं होती। मामला आयकर कानून के उस प्रावधान से जुड़ा है, जो राजनीतिक दलों को 2,000 रुपये से कम की राशि नकद और बिना दाता की पहचान बताए स्वीकार करने की अनुमति देता है। याचिका में इस व्यवस्था को चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए गंभीर सवाल बताया गया है। सुप्रीम कोर्ट में आज होने वाली सुनवाई को राजनीतिक चंदे की पारदर्शिता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। याचिका में आयकर अधिनियम के उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जिसके तहत राजनीतिक दल 2,000 रुपये से कम का नकद चंदा स्वीकार कर सकते हैं और ऐसे चंदे के मामले में दानदाता की पहचान सामने आना जरूरी नहीं है। याचिकाकर्ता ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन के स्रोत की जानकारी चुनावी व्यवस्था में पारदर्शिता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जब किसी राजनीतिक दल को नकद राशि मिलती है और चंदा देने वाले व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक नहीं होती, तो मतदाताओं के सामने यह जानने का रास्ता सीमित हो जाता है कि राजनीतिक दलों को आर्थिक सहयोग कौन दे रहा है। याचिका में तर्क दिया गया है कि चुनाव केवल मतदान तक सीमित प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मतदाताओं को राजनीतिक दलों के बारे में पर्याप्त और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध होना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। यदि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के स्रोत की जानकारी छिपी रहती है, तो मतदाताओं के पास दलों की आर्थिक निर्भरता और संभावित हितों का आकलन करने के लिए पर्याप्त जानकारी नहीं रह जाती। याचिकाकर्ता का कहना है कि पारदर्शिता की कमी चुनाव प्रक्रिया की शुचिता को प्रभावित कर सकती है। मतदाता यह जानने से वंचित रह सकते हैं कि किसी राजनीतिक दल को आर्थिक रूप से किन लोगों या समूहों से समर्थन मिल रहा है।
ऐसी स्थिति में वे मतदान के समय उपलब्ध जानकारी के आधार पर पूरी तरह सूचित और तर्कसंगत निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते। मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ द्वारा किए जाने की संभावना है। सुनवाई के लिए सूचीबद्ध याचिकाओं के अनुसार, यह मामला आज अदालत के समक्ष आ सकता है। हालांकि अंतिम रूप से सुनवाई पीठ के कार्यभार और अदालत की कार्यवाही पर निर्भर करेगा। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर चुका है। अदालत ने संबंधित पक्षों से मामले में जवाब मांगा था। अब सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मुद्दा प्रमुख रूप से रहेगा कि 2,000 रुपये से कम के नकद और गुमनाम राजनीतिक चंदे की अनुमति देने वाला प्रावधान संवैधानिक और लोकतांत्रिक पारदर्शिता की कसौटी पर कितना उचित है।
गुमनाम चंदे की व्यवस्था पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
राजनीतिक दलों की फंडिंग लंबे समय से चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय रही है। राजनीतिक दल चुनाव लड़ने, संगठन चलाने, प्रचार करने और विभिन्न गतिविधियों के लिए बड़ी मात्रा में धन जुटाते हैं। ऐसे में यह सवाल लगातार उठता रहा है कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन का स्रोत कितना पारदर्शी होना चाहिए और आम मतदाता को इसकी कितनी जानकारी मिलनी चाहिए। मौजूदा विवाद में खास तौर पर 2,000 रुपये से कम के नकद चंदे का मुद्दा सामने है। याचिका का केंद्र यही प्रावधान है। याचिकाकर्ता का कहना है कि अलग-अलग छोटे चंदों के रूप में आने वाली रकम का कुल प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि इन भुगतानों के स्रोत की पहचान सामने नहीं आती, तो राजनीतिक दलों की आय के एक हिस्से की निगरानी और सार्वजनिक जांच मुश्किल हो सकती है। याचिका में चुनावी प्रक्रिया की शुचिता का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता केवल उम्मीदवार का नाम देखकर मतदान नहीं करता, बल्कि राजनीतिक दल की नीतियों, उसके कामकाज और उसके संभावित हितों को ध्यान में रखकर भी निर्णय लेता है। ऐसे में राजनीतिक दलों की आर्थिक स्थिति और उन्हें मिलने वाले वित्तीय सहयोग की जानकारी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल को लगातार ऐसे स्रोतों से धन मिलता है जिनकी पहचान सामने नहीं आती, तो मतदाता यह समझने में कठिनाई महसूस कर सकता है कि दल के आर्थिक हित किन लोगों या समूहों से जुड़े हो सकते हैं। इसी आधार पर याचिका में कहा गया है कि राजनीतिक चंदे की व्यवस्था में पारदर्शिता लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
मामले में केंद्र सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नोटिस के बाद संबंधित पक्षों को इस प्रावधान के पक्ष में अपना संवैधानिक और कानूनी आधार बताना होगा। अदालत यह भी देख सकती है कि छोटे नकद चंदे के लिए बनाई गई व्यवस्था का उद्देश्य क्या था और वर्तमान समय में यह व्यवस्था पारदर्शिता तथा चुनावी जवाबदेही की आवश्यकताओं के अनुरूप है या नहीं। इस सुनवाई का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि राजनीतिक दलों की फंडिंग से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और मतदाता के सूचना के अधिकार के बीच संतुलन का सवाल लगातार सामने आता रहा है। एक ओर छोटे दानदाताओं के लिए चंदा देना आसान बनाए रखने की दलील हो सकती है, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों को मिलने वाले धन के स्रोत को लेकर सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न है।
कोर्ट के सामने यह भी महत्वपूर्ण सवाल हो सकता है कि 2,000 रुपये से कम के नकद चंदे की सीमा को किस नजरिए से देखा जाए। क्या इतनी छोटी राशि को अलग से पहचान गुप्त रखने की अनुमति देना उचित है या राजनीतिक दलों को मिलने वाले हर प्रकार के आर्थिक सहयोग के लिए अधिक पारदर्शी व्यवस्था होनी चाहिए। याचिका की सुनवाई में इन पहलुओं पर चर्चा होने की संभावना है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई पर राजनीतिक दलों की फंडिंग और चुनावी पारदर्शिता से जुड़े पक्षों की नजर है। अदालत की ओर से आने वाली टिप्पणी या कोई अंतरिम अथवा अंतिम निर्देश राजनीतिक चंदे की मौजूदा व्यवस्था पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। हालांकि मामले में अंतिम निर्णय अदालत की विस्तृत सुनवाई और सभी संबंधित पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही सामने आएगा।

















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