महंगाई को लेकर अलर्ट भारतीय रिजर्व बैंक, ब्याज दरों पर अपनाई ‘रुको और देखो’ नीति

भारतीय अर्थव्यवस्था ऐसे समय से गुजर रही है जब एक ओर महंगाई नियंत्रित दायरे में दिखाई दे रही है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक और घरेलू परिस्थितियां भविष्य को लेकर कई तरह की अनिश्चितताएं पैदा कर रही हैं। यही वजह है कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने फिलहाल सतर्क रुख अपनाते हुए नीतिगत ब्याज दरों में किसी तरह का बदलाव नहीं किया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि वर्तमान समय में जल्दबाजी में कोई बड़ा कदम उठाने के बजाय हालात पर लगातार नजर रखना अधिक उचित होगा। हाल ही में संपन्न हुई मौद्रिक नीति समिति की बैठक के मिनट्स जारी होने के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा समेत समिति के सभी छह सदस्यों ने रेपो रेट को यथावत रखने के पक्ष में मतदान किया। बैठक में यह सहमति बनी कि मौजूदा परिस्थितियों में आर्थिक विकास को समर्थन देने और महंगाई को नियंत्रण में रखने के लिए संतुलित नीति अपनाना जरूरी है। आरबीआई ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। 

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है। इस दर में बदलाव का सीधा असर बैंक ऋण, ईएमआई, निवेश और बाजार की गतिविधियों पर पड़ता है। ऐसे में रेपो रेट को स्थिर रखने के फैसले को आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। मौद्रिक नीति समिति की बैठक के विवरण से पता चलता है कि आरबीआई फिलहाल महंगाई और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि हाल के महीनों में खुदरा महंगाई दर में कुछ नरमी देखने को मिली है, लेकिन केंद्रीय बैंक को आशंका है कि आने वाले समय में कई ऐसे कारक उभर सकते हैं जो कीमतों पर दबाव बढ़ा सकते हैं। 

गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बैठक के दौरान कहा कि महंगाई के विभिन्न स्रोतों पर लगातार नजर रखने की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान आर्थिक माहौल में अभी भी कई जोखिम मौजूद हैं, जिनके कारण भविष्य के अनुमान बदल सकते हैं। उनका कहना था कि वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता, आपूर्ति श्रृंखला में संभावित व्यवधान और मौसम संबंधी परिस्थितियां आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक फिलहाल “वेट एंड वॉच” यानी “देखो और इंतजार करो” की रणनीति को अधिक उपयुक्त मानता है। उनके अनुसार मौजूदा हालात में ब्याज दरों में जल्दबाजी में बदलाव करने के बजाय आर्थिक संकेतकों का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करना बेहतर होगा। यही कारण है कि उन्होंने नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रखने और आरबीआई के न्यूट्रल रुख को जारी रखने के पक्ष में मतदान किया।

पश्चिम एशिया तनाव, मानसून और सप्लाई चेन की चुनौतियों ने बढ़ाई आरबीआई की चिंता

आरबीआई की चिंता का सबसे बड़ा कारण वैश्विक स्तर पर बनी अनिश्चितता है। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव का असर अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों, समुद्री व्यापार और वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ सकता है। यदि यह स्थिति और गंभीर होती है तो भारत जैसे आयात-निर्भर देशों में महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है। इसके अलावा आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की रुकावट वस्तुओं की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। इससे उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। आरबीआई का मानना है कि वैश्विक घटनाक्रमों पर लगातार नजर बनाए रखना आवश्यक है क्योंकि उनका सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। 

घरेलू स्तर पर मानसून भी केंद्रीय बैंक की चिंताओं में शामिल है। भारत की बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है और कृषि उत्पादन काफी हद तक मानसून पर आधारित रहता है। यदि वर्षा सामान्य से कम या असमान रूप से होती है तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसका असर खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर पड़ता है और महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। बिजली उत्पादन, जल संसाधन, कृषि उपज और ग्रामीण मांग जैसे कई क्षेत्र मानसून की स्थिति से प्रभावित होते हैं। इसलिए केंद्रीय बैंक मानसून की प्रगति पर भी करीबी नजर रख रहा है। आरबीआई का आकलन है कि मौसम संबंधी परिस्थितियां आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। इसी बीच आरबीआई ने विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने और रुपये को मजबूती देने के लिए भी कुछ कदम उठाए हैं। 

केंद्रीय बैंक का उद्देश्य वैश्विक अस्थिरता के दौर में वित्तीय बाजारों में विश्वास बनाए रखना और निवेशकों को सकारात्मक संकेत देना है। मजबूत विदेशी निवेश न केवल रुपये को समर्थन देता है बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी गति प्रदान करता है। रिजर्व बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खुदरा महंगाई दर 5.1 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। वहीं देश की आर्थिक विकास दर यानी जीडीपी ग्रोथ 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है। हालांकि RBI ने यह भी स्वीकार किया है कि बदलते वैश्विक और घरेलू हालात इन अनुमानों को प्रभावित कर सकते हैं। आरबीआई का ताजा रुख यह संकेत देता है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल स्थिरता को प्राथमिकता दे रहा है। महंगाई और विकास दर दोनों पर नजर रखते हुए आरबीआई कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले आर्थिक परिस्थितियों का गहन मूल्यांकन करना चाहता है। ऐसे में आने वाले महीनों में महंगाई, मानसून, वैश्विक तनाव और निवेश प्रवाह जैसे कारक भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

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