कई महीनों से जारी तनाव, सैन्य टकराव और युद्ध की आशंकाओं के बीच आखिरकार वह क्षण आ ही गया, जिसका दुनिया को लंबे समय से इंतजार था। भारतीय समयानुसार गुरुवार सुबह अमेरिका और ईरान ने मध्य पूर्व में शांति बहाली की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर कर दिए। इस समझौते को क्षेत्र में जारी संघर्ष को समाप्त करने और स्थायी शांति स्थापित करने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। फ्रांस के ऐतिहासिक वर्साय पैलेस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की मौजूदगी में इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने के उद्देश्य से तैयार किए गए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
इससे पहले अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और ईरानी संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकेर गालिबाफ भी इस दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर चुके थे। उधर, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकाई ने कहा कि समझौता ज्ञापन के मसौदे को दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के हस्ताक्षरों के साथ अंतिम रूप दे दिया गया है और अब इसके क्रियान्वयन की परीक्षा का समय शुरू हो गया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समझौता क्षेत्र में स्थिरता और शांति का नया अध्याय लिखेगा। इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देश लेबनान समेत सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने पर सहमत हुए हैं। दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध या किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई नहीं करने का वादा किया है।
साथ ही बल प्रयोग या उसकी धमकी से भी बचने की प्रतिबद्धता जताई गई है। समझौते में लेबनान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को सुरक्षित रखने का भी प्रावधान किया गया है। दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और स्वतंत्रता का सम्मान करने तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का आश्वासन दिया है। समझौते के अनुसार अधिकतम 60 दिनों के भीतर अंतिम शांति समझौते पर बातचीत पूरी करने का लक्ष्य रखा गया है। एमओयू पर हस्ताक्षर के साथ ही अमेरिका ने ईरान के खिलाफ लागू नौसैनिक नाकाबंदी और अन्य प्रतिबंधात्मक व्यवस्थाओं को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने का वादा किया है। अगले 30 दिनों के भीतर समुद्री नाकाबंदी पूरी तरह समाप्त की जाएगी और जहाजों की आवाजाही को युद्ध-पूर्व स्थिति के अनुरूप बहाल किया जाएगा। इसके अलावा अंतिम समझौते के 30 दिनों के भीतर अमेरिका ईरान के आसपास के क्षेत्रों से अपनी अतिरिक्त सैन्य मौजूदगी भी हटाएगा।
परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक पुनर्निर्माण पर भी बनी सहमति
समझौते में समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को सामान्य बनाने पर भी विशेष जोर दिया गया है। ईरान ने अगले 60 दिनों तक फारस की खाड़ी और ओमान सागर के बीच वाणिज्यिक जहाजों को सुरक्षित मार्ग उपलब्ध कराने का भरोसा दिया है। साथ ही समुद्री मार्गों में मौजूद तकनीकी और सैन्य बाधाओं को हटाने तथा बारूदी सुरंगों की सफाई के बाद सामान्य वाणिज्यिक गतिविधियों को फिर से शुरू किया जाएगा। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग माना जाता है, उसके भविष्य के प्रशासन और संचालन को लेकर ईरान ओमान तथा अन्य तटीय देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप बातचीत करेगा। इससे वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता आने की उम्मीद जताई जा रही है।
आर्थिक मोर्चे पर भी यह समझौता बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अमेरिका ने अपने क्षेत्रीय साझेदार देशों के साथ मिलकर ईरान के पुनर्निर्माण और आर्थिक विकास के लिए कम से कम 300 अरब डॉलर की व्यापक योजना तैयार करने पर सहमति जताई है। इस योजना के क्रियान्वयन की रूपरेखा 60 दिनों के भीतर तय की जाएगी। इसके लिए आवश्यक वित्तीय लेनदेन, लाइसेंस, छूट और अनुमतियां उपलब्ध कराने का भी आश्वासन दिया गया है। सबसे बड़ी राहत ईरान पर वर्षों से लागू आर्थिक प्रतिबंधों को लेकर मिली है। अमेरिका ने अंतिम समझौते के तहत चरणबद्ध तरीके से सभी प्रमुख प्रतिबंध समाप्त करने का वचन दिया है। इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों से जुड़े प्रतिबंध, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से संबंधित प्रावधान और अमेरिकी एकतरफा आर्थिक प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों देशों ने माना है कि प्रतिबंधों की समाप्ति शांति प्रक्रिया की सफलता के लिए बेहद जरूरी है।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अहम सहमति बनी है। ईरान ने दोहराया है कि वह परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा और न ही उनके विकास की दिशा में कोई कदम उठाएगा। संवर्धित यूरेनियम को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की निगरानी में नष्ट किया जाएगा। अंतिम समझौते तक ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार नहीं करेगा, जबकि अमेरिका नए प्रतिबंध लगाने या अतिरिक्त सैन्य बल तैनात करने से परहेज करेगा। समझौते के तहत अमेरिका ईरान की रोकी गई या जब्त की गई संपत्तियों और वित्तीय संसाधनों को लौटाने की प्रक्रिया भी शुरू करेगा। साथ ही ईरानी तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात के लिए आवश्यक बैंकिंग, बीमा और परिवहन सेवाओं को तत्काल राहत देने का भी प्रावधान किया गया है। समझौते में यह भी तय किया गया है कि अंतिम शांति समझौता होने तक दोनों देश यथास्थिति बनाए रखेंगे। इस दौरान ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में कोई बड़ा बदलाव नहीं करेगा और अमेरिका क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य तैनाती या नए प्रतिबंध लगाने से बचेगा। इसका उद्देश्य विश्वास बहाली और वार्ता प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है।
दोनों देशों ने इस बात पर भी सहमति जताई है कि समझौते के सफल क्रियान्वयन और भविष्य में होने वाले अंतिम शांति समझौते की निगरानी के लिए एक संयुक्त कार्यकारी तंत्र स्थापित किया जाएगा। यह तंत्र समझौते की सभी शर्तों के पालन की समीक्षा करेगा और किसी भी विवाद की स्थिति में समाधान का माध्यम बनेगा। यदि यह समझौता पूरी तरह लागू होता है तो यह केवल अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थायी शांति और आर्थिक स्थिरता का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। साथ ही वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकते हैं। ऐसे में दुनिया की निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि अगले 60 दिनों में प्रस्तावित अंतिम शांति समझौता किस रूप में सामने आता है और दोनों देश अपने वादों को किस हद तक जमीन पर उतार पाते हैं।

















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