विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भारतीय बैंक एक बार फिर आकर्षक निवेश विकल्प लेकर आए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया नीति के बाद देश के बैंक एनआरआई ग्राहकों को लुभाने के लिए एफसीएनआर (बी) जमा योजनाओं पर रिकॉर्ड स्तर की ब्याज दरें पेश कर रहे हैं। इसका असर यह हुआ है कि विदेशी मुद्रा जमा को लेकर बैंकिंग क्षेत्र में नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो गई है। आने वाले महीनों में इस कदम से भारत में अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा आ सकती है, जिससे देश के विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूती मिलेगी और रुपये पर दबाव भी कम होगा।
दरअसल, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत सरकार और आरबीआई विदेशी निवेश तथा विदेशी मुद्रा प्रवाह को बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में एनआरआई निवेशकों को आकर्षित करना एक अहम रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (बैंक) यानी एफसीएनआर (बी) जमा लंबे समय से एनआरआई निवेशकों के लिए सुरक्षित और लोकप्रिय निवेश साधन रहे हैं। अब इन पर बढ़ी हुई ब्याज दरों ने इन्हें और अधिक आकर्षक बना दिया है। आरबीआई की नई व्यवस्था लागू होने के बाद कई बैंकों ने अपनी जमा योजनाओं की दरों में संशोधन शुरू कर दिया है। निजी क्षेत्र के प्रमुख बैंक एचडीएफसी बैंक ने एफसीएनआर (बी) जमा पर ब्याज दरों में 2.6 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की है। इसके बाद बैंक 3 से 5 साल की अवधि वाले जमा पर अधिकतम 6 प्रतिशत तक ब्याज दे रहा है।
बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार यह बढ़ोतरी सामान्य परिस्थितियों की तुलना में काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सिर्फ एचडीएफसी बैंक ही नहीं, बल्कि अन्य बैंक भी एनआरआई ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धा में उतर चुके हैं। यस बैंक और एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक ने भी अपनी ब्याज दरों में इजाफा किया है। ये बैंक 3 से 5 साल की अवधि वाले एफसीएनआर (बी) जमा पर 7.10 प्रतिशत तक का ब्याज ऑफर कर रहे हैं। इतनी ऊंची ब्याज दरें वैश्विक स्तर पर उपलब्ध कई बैंकिंग उत्पादों की तुलना में अधिक मानी जा रही हैं। बैंकों का कहना है कि आरबीआई की नई सुविधा ने उनकी लागत में बड़ी कमी की है।
पहले विदेशी मुद्रा जमा जुटाने पर विनिमय दर में उतार-चढ़ाव से बचने के लिए बैंकों को हेजिंग पर भारी खर्च करना पड़ता था। यह खर्च सीधे बैंक की लाभप्रदता और ग्राहकों को मिलने वाली ब्याज दरों को प्रभावित करता था। लेकिन अब केंद्रीय बैंक की नई व्यवस्था के कारण यह बोझ काफी हद तक कम हो गया है। पिछले सप्ताह आरबीआई ने घोषणा की थी कि 3 से 5 साल की अवधि वाले नए एफसीएनआर (बी) जमा पर विदेशी मुद्रा जोखिम से बचाव की पूरी लागत वह स्वयं वहन करेगा। यह विशेष सुविधा 30 सितंबर तक उपलब्ध रहेगी। इसके चलते बैंकों को विदेशी मुद्रा जोखिम प्रबंधन पर अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ेगा और वे उसका लाभ निवेशकों को उच्च ब्याज दरों के रूप में दे सकेंगे।
45 अरब डॉलर तक विदेशी मुद्रा आने की उम्मीद, विदेशी मुद्रा भंडार होगा मजबूत
आरबीआई की इस पहल को लेकर वित्तीय संस्थानों और बाजार विशेषज्ञों ने सकारात्मक अनुमान जताए हैं। उनका मानना है कि बढ़ी हुई ब्याज दरें और हेजिंग लागत में राहत एनआरआई निवेशकों को भारत की ओर आकर्षित कर सकती है। इससे देश में बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा आने की संभावना है। वैश्विक वित्तीय संस्था बार्कलेज का अनुमान है कि इस योजना के जरिए भारत में 25 से 30 अरब डॉलर तक का नया निवेश आ सकता है। वहीं एमयूएफजी बैंक ने करीब 20 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा प्रवाह का अनुमान लगाया है। दूसरी ओर एसबीआई रिसर्च इससे भी आगे बढ़कर 40 से 45 अरब डॉलर तक निवेश आने की संभावना जता चुका है।
यदि ये अनुमान वास्तविकता में बदलते हैं तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को बड़ा सहारा मिलेगा। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने से न केवल रुपये की स्थिरता बढ़ेगी बल्कि वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के दौरान देश की वित्तीय स्थिति भी मजबूत बनी रहेगी। विशेषज्ञों के अनुसार आयात भुगतान, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में भी इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिल सकता है। आरबीआई ने स्पष्ट किया है कि एफसीएनआर (बी) जमा पर ब्याज दर तय करने की स्वतंत्रता बैंकों के पास रहेगी। बैंक अपनी व्यावसायिक जरूरतों और बाजार परिस्थितियों के अनुसार दरें निर्धारित कर सकते हैं। हालांकि उन्हें नियामकीय दिशा-निर्देशों और निर्धारित सीमाओं का पालन करना होगा।
केंद्रीय बैंक के अनुसार यह स्वैप सुविधा किसी भी स्वतंत्र रूप से परिवर्तनीय विदेशी मुद्रा में जुटाए गए नए एफसीएनआर (बी) जमा पर लागू होगी। हालांकि आरबीआई के साथ होने वाला स्वैप केवल अमेरिकी डॉलर में किया जाएगा। इससे पूरी प्रक्रिया को सरल और प्रभावी बनाए रखने में मदद मिलेगी। इस योजना के तहत एक महत्वपूर्ण शर्त भी रखी गई है। एफसीएनआर (बी) जमा पर कम से कम एक वर्ष की लॉक-इन अवधि लागू होगी। इसका मतलब यह है कि निवेशक एक साल पूरा होने से पहले अपनी जमा राशि नहीं निकाल सकेंगे। इससे बैंकों को स्थिर विदेशी मुद्रा संसाधन उपलब्ध होंगे और वित्तीय प्रणाली को दीर्घकालिक मजबूती मिलेगी। बैंकिंग क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि बढ़ी हुई ब्याज दरों और आरबीआई की विशेष सुविधा के कारण आने वाले महीनों में एनआरआई निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। यदि ऐसा होता है तो यह कदम भारतीय बैंकिंग क्षेत्र के साथ-साथ देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा सहारा साबित होगा।

















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