छह माह के बाद जयकारों से गूंज उठा हेमकुंड साहिब, बर्फीली वादियों के बीच खुले कपाट, श्रद्धालुओं ने टेका माथा

उत्तराखंड स्थित विश्व प्रसिद्ध सिख तीर्थस्थल हेमकुंड साहिब के कपाट शनिवार, 23 मई की दोपहर श्रद्धालुओं के लिए विधि-विधान और अरदास के साथ खोल दिए गए। कपाट खुलते ही पूरी लोकपाल घाटी “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल” के जयकारों से गूंज उठी। इस ऐतिहासिक अवसर का साक्षी बनने के लिए देशभर से पहुंचे तीन हजार से अधिक श्रद्धालु मौजूद रहे। कपाट खुलने के साथ ही छह महीने बाद एक बार फिर हिमालय की गोद में बसे इस पवित्र धाम में रौनक लौट आई। सुबह से ही श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिला। पंच प्यारों की अगुवाई में सिख श्रद्धालुओं का पहला जत्था गोविंदघाट से रवाना होकर कठिन यात्रा पूरी करते हुए हेमकुंड साहिब पहुंचा। श्रद्धालुओं के चेहरे पर थकान कम और गुरु आस्था का उत्साह अधिक दिखाई दे रहा था।

धार्मिक परंपराओं के अनुसार अरदास, शबद-कीर्तन और विशेष पूजा-अर्चना के बाद ठीक सुबह 11:30 बजे कपाट श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए गए। कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं ने गुरु घर में माथा टेककर सुख-समृद्धि और विश्व कल्याण की कामना की। 

इस मौके पर गुरुद्वारे को करीब पांच क्विंटल फूलों से बेहद भव्य तरीके से सजाया गया था। रंग-बिरंगे फूलों से सजे पवित्र धाम की सुंदरता बर्फ से ढकी पहाड़ियों के बीच और भी मनमोहक नजर आ रही थी। श्रद्धालु इस अद्भुत दृश्य को अपने कैमरों में कैद करते दिखाई दिए। समुद्र तल से लगभग 15,225 फीट की ऊंचाई पर स्थित हेमकुंड साहिब दुनिया के सबसे ऊंचे गुरुद्वारों में गिना जाता है। सप्तश्रृंग पर्वत श्रृंखलाओं और हिमाच्छादित चोटियों के बीच स्थित यह तीर्थस्थल सिख समुदाय की आस्था का प्रमुख केंद्र है। माना जाता है कि सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूर्व जन्म में इसी स्थान पर तपस्या की थी। यही कारण है कि हर साल हजारों श्रद्धालु कठिन परिस्थितियों के बावजूद यहां पहुंचते हैं। हेमकुंड साहिब की यात्रा जितनी पवित्र मानी जाती है, उतनी ही कठिन भी है। श्रद्धालुओं को गोविंदघाट से लगभग 18 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई और दुर्गम पैदल रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। 

यात्रा मार्ग में लगातार बदलता मौसम, ऑक्सीजन की कमी और ऊंचाई यात्रियों की परीक्षा लेती है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था हर मुश्किल पर भारी पड़ती दिखाई देती है। इस बार भी यात्रा शुरू होने से पहले सेना के जवानों और प्रशासन की टीमों ने बर्फ हटाकर रास्ता तैयार किया। कई जगहों पर कई फीट ऊंची बर्फ जमा होने के कारण यात्रा मार्ग को सुचारू बनाने में काफी मेहनत करनी पड़ी। हालांकि कपाट खुलने के बाद भी धाम परिसर और आसपास के इलाकों में अब भी भारी मात्रा में बर्फ जमी हुई है। हेमकुंड साहिब के कपाट खुलते ही भ्यूंडार घाटी में भी रौनक लौट आई है। यात्रा मार्ग पर स्थित होटल, लॉज, ढाबे और स्थानीय व्यवसाय फिर से सक्रिय हो गए हैं। 

लंबे शीतकाल के बाद घाटी में श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू होने से स्थानीय लोगों के चेहरों पर भी खुशी दिखाई दे रही है। यात्रा के दौरान सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। यात्रा मार्ग पर मेडिकल टीम, पुलिस बल और आपदा राहत कर्मियों की तैनाती की गई है ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सहायता पहुंचाई जा सके। प्रशासन लगातार श्रद्धालुओं से मौसम की जानकारी लेकर ही यात्रा करने और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां बरतने की अपील कर रहा है।

15 हजार फीट की ऊंचाई, कई फीट बर्फ और कठिन चढ़ाई, बेहद चुनौतीपूर्ण मानी जाती है हेमकुंड साहिब यात्रा

हेमकुंड साहिब की यात्रा देश की सबसे कठिन धार्मिक यात्राओं में गिनी जाती है। समुद्र तल से करीब 15,225 फीट की ऊंचाई पर स्थित यह पवित्र धाम साल के अधिकांश समय बर्फ से ढंका रहता है। यहां का तापमान कई बार शून्य से नीचे पहुंच जाता है, जिससे यात्रा और भी चुनौतीपूर्ण बन जाती है। श्रद्धालुओं को गोविंदघाट से घांघरिया तक पहले लंबा सफर तय करना पड़ता है, जिसके बाद हेमकुंड साहिब तक खड़ी चढ़ाई शुरू होती है। कई जगह रास्ते बेहद संकरे और फिसलन भरे होते हैं। ऊंचाई बढ़ने के साथ सांस लेने में परेशानी और ऑक्सीजन की कमी भी महसूस होने लगती है। यही कारण है कि बुजुर्गों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है। 

इसके बावजूद हर साल हजारों श्रद्धालु गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा के साथ इस कठिन यात्रा को पूरा करते हैं। श्रद्धालुओं का मानना है कि हेमकुंड साहिब पहुंचते ही सारी थकान और तकलीफ दूर हो जाती है। बर्फीली पहाड़ियों, शांत झील और आध्यात्मिक वातावरण के बीच स्थित यह पवित्र धाम श्रद्धालुओं को अद्भुत आत्मिक शांति का अनुभव कराता है। कपाट खुलने के साथ ही अब आने वाले दिनों में यहां श्रद्धालुओं की संख्या तेजी से बढ़ने की संभावना है। प्रशासन और गुरुद्वारा प्रबंधन समिति ने यात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए सभी जरूरी इंतजाम किए हैं। हिमालय की गोद में बसे इस पवित्र धाम में एक बार फिर आस्था, श्रद्धा और भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

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