दुनियाभर की अर्थव्यवस्था को झकझोर देने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है। गुरुवार सुबह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें अचानक उछलकर 125 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। यह तेजी किसी सामान्य बाजार उतार-चढ़ाव का नतीजा नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अनिश्चितता का सीधा असर है। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत रुकने से हालात और बिगड़ गए हैं, जिससे यह आशंका गहरा गई है कि होर्मुज जलडमरूमध्य जल्द नहीं खुलेगा और युद्ध की स्थिति लंबी खिंच सकती है। बाजार खुलते ही जून डिलीवरी वाला ब्रेंट कच्चा तेल 6 प्रतिशत से अधिक उछलकर 125.36 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि जुलाई डिलीवरी वाला अनुबंध भी बढ़त के साथ 113.85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया।
यह बढ़ोतरी इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि कुछ ही महीने पहले, जब युद्ध शुरू नहीं हुआ था, तब कच्चा तेल करीब 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। यानी बहुत कम समय में कीमतों में लगभग दोगुनी बढ़ोतरी ने वैश्विक बाजार को अस्थिर कर दिया है। ईरान से जुड़ा यह संघर्ष अब नौवें सप्ताह में पहुंच चुका है और इसके जल्द खत्म होने के संकेत नजर नहीं आ रहे। अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी जारी रखी हुई है, वहीं दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य बंद पड़ा है। इस मार्ग से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है, ऐसे में इसके बंद होने से बाजार में आपूर्ति को लेकर गंभीर संकट की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की ओर से भी हालात को लेकर सख्त रुख के संकेत मिले हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, उन्होंने तनाव बढ़ने की संभावना जताई है और किसी समझौते की दिशा में फिलहाल नरमी के संकेत नहीं दिए हैं। इससे बाजार में यह धारणा मजबूत हुई है कि निकट भविष्य में हालात सामान्य होने की उम्मीद कम है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का कहना है कि जब तक जलडमरूमध्य नहीं खुलता और आपूर्ति बहाल नहीं होती, तब तक कीमतों में उतार-चढ़ाव जारी रहेगा। इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल तेल बाजार तक सीमित नहीं रहा। दुनिया भर के शेयर बाजारों में भी इसका असर साफ दिखाई दिया।
अमेरिका में कमजोर प्रदर्शन के बाद एशियाई बाजारों में गिरावट दर्ज की गई। जापान, दक्षिण कोरिया और हांगकांग के प्रमुख सूचकांक नीचे आए, जिससे निवेशकों में चिंता का माहौल बन गया। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। तेल की कीमतों में इस तरह की तेजी का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो परिवहन लागत बढ़ेगी, जिससे खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक महंगाई बढ़ सकती है। इसके अलावा, सरकार पर सब्सिडी और राजकोषीय घाटे का दबाव भी बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें 120 डॉलर से ऊपर लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो यह भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर भी असर डाल सकती है। रुपये पर दबाव बढ़ने की भी संभावना है, जिससे आयात और महंगा हो जाएगा।
भारत को करनी होगी रणनीतिक तैयारी
तेल की कीमतों में आई इस तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है, लंबे समय से बंद पड़ा है। इससे खाड़ी क्षेत्र से होने वाली आपूर्ति बाधित हो गई है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का कहना है कि यदि यह मार्ग जल्द नहीं खुलता, तो वैश्विक ऊर्जा संकट गहरा सकता है। इसी बीच, वैश्विक बाजारों में भी अस्थिरता बढ़ गई है। जापान का प्रमुख सूचकांक निक्केई करीब डेढ़ प्रतिशत गिर गया, जबकि दक्षिण कोरिया और हांगकांग के बाजारों में भी गिरावट देखी गई। हालांकि चीन के बाजार में हल्की बढ़त दर्ज की गई, लेकिन वहां भी औद्योगिक गतिविधियों में सुस्ती के संकेत मिले हैं।
यह स्थिति केवल अल्पकालिक झटका नहीं है, बल्कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है तो इसके दूरगामी असर होंगे। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने से उत्पादन लागत बढ़ेगी, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। भारत के लिए यह समय सतर्कता का है। सरकार को वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों पर ध्यान देना होगा और तेल भंडारण क्षमता को मजबूत करना होगा। साथ ही, आम लोगों को राहत देने के लिए करों में कटौती या अन्य उपायों पर भी विचार करना पड़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतों में यह उछाल केवल एक आर्थिक खबर नहीं, बल्कि एक ऐसा संकेत है जो आने वाले समय में वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था की दिशा तय कर सकता है।

















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