कमजोर मानसून की आहट से बढ़ी महंगाई की चिंता, खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी

भारत में इस साल मानसून को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक, किसानों और बाजार सभी की चिंता बढ़ा दी है। मौसम वैज्ञानिकों द्वारा अल नीनो की स्थिति बनने की आशंका जताए जाने के बाद यह डर गहरा गया है कि यदि बारिश सामान्य से कम रही तो इसका सीधा असर खेती, खाद्य उत्पादन और महंगाई पर पड़ेगा। ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी से देश को कुछ राहत मिलने की उम्मीद है, वहीं खाद्य वस्तुओं की बढ़ती कीमतें उस राहत को काफी हद तक खत्म कर सकती हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में मानसून की भूमिका बेहद अहम है। देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि पर निर्भर है और खेती का अधिकांश हिस्सा वर्षा आधारित है। जून से सितंबर के बीच होने वाली बारिश पूरे कृषि चक्र की दिशा तय करती है। धान, दालें, तिलहन, मक्का, बाजरा और कई अन्य खरीफ फसलें समय पर और पर्याप्त बारिश पर निर्भर करती हैं। यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो उत्पादन घटने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे बाजार में आपूर्ति कम होती है और खाद्य वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़ने लगते हैं। 

कमजोर मानसून केवल खेतों तक सीमित समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे आर्थिक तंत्र पर दिखाई देता है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय घटती है, उपभोक्ता खर्च कम होता है, कृषि उपकरणों और उर्वरकों की मांग घटती है और इसका प्रभाव उद्योगों व खुदरा बाजार तक पहुंचता है। यही वजह है कि हर साल मानसून की प्रगति पर सरकार और केंद्रीय बैंक की विशेष नजर रहती है। हालिया आंकड़ों ने चिंता और बढ़ा दी है। जून के तीसरे सप्ताह तक देश के कई हिस्सों में सामान्य से काफी कम वर्षा दर्ज की गई। यदि आने वाले सप्ताहों में बारिश की कमी बनी रहती है तो खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। इससे खाद्यान्न उत्पादन पर दबाव बढ़ेगा और आने वाले महीनों में महंगाई एक बार फिर आम लोगों की जेब पर भारी पड़ सकती है। कमजोर मानसून का सबसे पहला असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। 

जब किसानों को अच्छी फसल की उम्मीद नहीं रहती तो वे खाद, बीज और कृषि उपकरणों पर खर्च कम कर देते हैं। कई किसान ट्रैक्टर या अन्य मशीनरी खरीदने का फैसला टाल देते हैं। त्योहारों के दौरान भी ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग घट जाता है, जिससे ऑटोमोबाइल, एफएमसीजी और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री पर भी असर पड़ता है। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी माना है कि मानसून और खाद्य महंगाई की स्थिति पर उसकी लगातार नजर बनी हुई है। फिलहाल केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर रखा है, लेकिन यदि खाद्य महंगाई लगातार बढ़ती है तो भविष्य में मौद्रिक नीति को लेकर नए कदम उठाने पड़ सकते हैं। आरबीआई के लिए सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक विकास और महंगाई के बीच संतुलन बनाए रखना होगी।

सरकार ने शुरू की तैयारी, लेकिन दाल और खाद्य तेल बढ़ा सकते हैं मुश्किलें

कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर खाद्य महंगाई पर पड़ता है। क्वांटइको रिसर्च की अर्थशास्त्री युविका सिंघल के अनुसार यदि पूरे मानसून सीजन में बारिश सामान्य से लगभग 10 प्रतिशत कम रहती है तो खुदरा महंगाई में करीब एक प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है। खासकर सब्जियां, दालें, तिलहन और अन्य कृषि उत्पाद तेजी से महंगे हो सकते हैं। सरकार के पास फिलहाल गेहूं और चावल का पर्याप्त भंडार मौजूद है। ऐसे में जरूरत पड़ने पर सार्वजनिक वितरण प्रणाली और खुले बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर इन अनाजों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है। दालों, तिलहनों और मोटे अनाज के मामले में स्थिति इतनी मजबूत नहीं है। 

इन फसलों का उत्पादन घटा तो इनके दाम तेजी से बढ़ सकते हैं। यदि बारिश की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो अक्टूबर तक खुदरा महंगाई 5.5 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में आरबीआई के लिए ब्याज दरों में कटौती की संभावना कमजोर पड़ सकती है और जरूरत पड़ने पर दरें बढ़ाने जैसे विकल्पों पर भी विचार करना पड़ सकता है। खाद्य तेल के मोर्चे पर भी चिंता बनी हुई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से आयात करता है। यदि वहां भी अल नीनो के कारण बारिश प्रभावित होती है और उत्पादन घटता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में खाद्य तेल महंगा हो सकता है। इसका सीधा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।संभावित संकट को देखते हुए केंद्र सरकार ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है। कम वर्षा की आशंका वाले 315 जिलों की पहचान की गई है, जिनमें 111 जिलों को अत्यधिक संवेदनशील माना गया है। इन क्षेत्रों में किसानों को कम पानी वाली वैकल्पिक फसलें अपनाने, जल संरक्षण तकनीकों के उपयोग और सिंचाई प्रबंधन के लिए आवश्यक सहायता देने की योजना बनाई गई है। कृषि विभाग और राज्य सरकारों को भी समय रहते आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए गए हैं। 

सरकार का उद्देश्य यह है कि यदि मानसून कमजोर भी रहे तो उत्पादन पर उसका असर न्यूनतम रहे और किसानों की आय में बड़ी गिरावट न आए। वर्ष 2023 में कमजोर मानसून और बढ़ती खाद्य महंगाई के बीच सरकार ने घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए चावल के निर्यात पर रोक लगाई थी। फिलहाल इस वर्ष ऐसी किसी पाबंदी के संकेत नहीं मिले हैं, यदि हालात बिगड़ते हैं तो सरकार बाजार में हस्तक्षेप करने से पीछे नहीं हटेगी। आने वाले कुछ सप्ताह मानसून की दिशा तय करेंगे और उसी के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि देश को राहत मिलेगी या खाद्य महंगाई की नई लहर का सामना करना पड़ेगा। फिलहाल सरकार, आरबीआई और कृषि विशेषज्ञ सभी की नजर आसमान पर टिकी हुई है, क्योंकि इस बार मानसून केवल खेतों की हरियाली ही नहीं, बल्कि आम आदमी की रसोई, महंगाई और देश की आर्थिक सेहत भी तय करेगा।

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