देश में लगातार बढ़ती ईंधन कीमतों और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच आम वाहन चालकों के लिए राहत भरी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार ने एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा देने के लिए बड़ा कदम उठाते हुए उच्च एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल पर केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी को शून्य करने का फैसला किया है। सरकार की इस नई नीति को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसका उद्देश्य न केवल पेट्रोल पर देश की निर्भरता कम करना है, बल्कि आम उपभोक्ताओं को सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना और किसानों की आय बढ़ाना भी है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में शामिल है और अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर देश के पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ता है। हाल के महीनों में मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहे दबाव ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा की हैं।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार ने एथेनॉल आधारित ईंधन को तेजी से बढ़ावा देने का निर्णय लिया है। नई व्यवस्था के तहत 22 प्रतिशत, 25 प्रतिशत, 27 प्रतिशत और 30 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल पर केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी पूरी तरह समाप्त कर दी गई है। हालांकि इसके लिए जरूरी होगा कि संबंधित ईंधन भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा निर्धारित गुणवत्ता मानकों पर खरा उतरे। सरकार का मानना है कि कर छूट मिलने से ऐसे ईंधन की लागत कम होगी और तेल कंपनियां इसे बड़े पैमाने पर बाजार में उतार सकेंगी।
एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल पारंपरिक पेट्रोल की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ता पड़ सकता है, क्योंकि इसमें आयातित कच्चे तेल की हिस्सेदारी कम होती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी का असर भी सीमित रहेगा। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में केंद्र सरकार लगातार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य बढ़ाती रही है। भारत पहले ही ई-20 कार्यक्रम को तेजी से लागू कर रहा है, जिसके तहत पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिलाया जा रहा है। अब सरकार और तेल कंपनियां इससे आगे बढ़ते हुए अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधनों को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रही हैं।
इसी क्रम में हाल ही में ई-85 ईंधन को भी बाजार में उतारने की पहल की गई है। ई-85 एक विशेष प्रकार का ईंधन है, जिसमें लगभग 85 प्रतिशत एथेनॉल और केवल 15 प्रतिशत पेट्रोल का उपयोग किया जाता है। दावा किया जा रहा है कि यह ईंधन मौजूदा ई-20 पेट्रोल की तुलना में काफी सस्ता साबित हो सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार इसकी कीमत में प्रति लीटर करीब 20 रुपये तक का अंतर देखने को मिल सकता है। यदि यह मॉडल बड़े स्तर पर सफल होता है तो भविष्य में वाहन चालकों को ईंधन खर्च में उल्लेखनीय राहत मिल सकती है।
किसानों से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक, कई मोर्चों पर मिलेगा फायदा
एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभ देश के किसानों को मिलने की उम्मीद है। एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने, मक्के तथा अन्य कृषि उत्पादों और खराब हो चुके अनाज से किया जाता है। ऐसे में एथेनॉल की मांग बढ़ने से कृषि क्षेत्र के लिए एक नया और स्थायी बाजार तैयार होगा। इससे किसानों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ेगी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी। केंद्र सरकार लंबे समय से किसानों की आय बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादों के वैकल्पिक उपयोग पर जोर देती रही है। एथेनॉल उद्योग के विस्तार से चीनी मिलों, डिस्टिलरी इकाइयों और कृषि आधारित उद्योगों को भी नया प्रोत्साहन मिलेगा। इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी।
सरकार के अनुसार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की वजह से देश अब तक बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत कर चुका है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय का मानना है कि आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता घटाने से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी और वैश्विक संकटों के दौरान भी ईंधन आपूर्ति पर असर कम पड़ेगा। हालांकि इस बदलाव के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। अधिक एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन का उपयोग सभी वाहनों में नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से ई-85 जैसे ईंधन के लिए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन या उसके अनुरूप तकनीक की आवश्यकता होती है। इसलिए वाहन निर्माताओं को भी नई तकनीक वाले वाहनों के उत्पादन पर तेजी से काम करना होगा। साथ ही देशभर में ऐसे ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए वितरण नेटवर्क को भी मजबूत बनाना पड़ेगा।
इसके बावजूद ऊर्जा विशेषज्ञ इस नीति को भारत के लिए दीर्घकालिक रूप से फायदेमंद मान रहे हैं। उनका कहना है कि यदि एथेनॉल उत्पादन, वितरण और वाहन तकनीक के बीच बेहतर तालमेल स्थापित हो जाता है तो आने वाले वर्षों में देश न केवल पेट्रोल आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा, बल्कि आम उपभोक्ताओं को भी अपेक्षाकृत सस्ता और पर्यावरण के अनुकूल ईंधन उपलब्ध कराया जा सकेगा। सरकार का ताजा फैसला इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम माना जा रहा है, जिसका लाभ उपभोक्ताओं, किसानों और देश की अर्थव्यवस्था तीनों को मिल सकता है।

















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